अंबेडकर के लिए एक सच्चे धर्म का अर्थ क्या है?

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अंबेडकर एक प्रगतिशील विद्वान तथा विचारक थे। वह समाज में समता, स्वतंत्रता तथा बंधुत्व स्थापित करना चाहते थे। भारत में वह हिन्दू धर्म के स्वरुप को अपने इस लक्ष्य का बाधक मानते थे। वो चाहते थे कि समाज ऐसे धर्मों का पालन करे जो ऊंच-नीच का द्वन्द ना बनाये। अंबेडकर के धर्म सम्बन्धी विचार “बुद्धा या कार्ल-मार्क्स” लेख में मिलता है। वह बताते हैं कि त्रिपिटकों के अध्ययन से वह इन विचारों पर पहुंचे। इस लेख में हम अंबेडकर के धर्म सम्बन्धी विचार पर प्रकाश डालेंगे।

“एक स्वतंत्र समाज के लिए धर्म आवश्यक है।”
“प्रत्येक धर्म अनुकरण करने लायक नहीं हैं।”

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अंबेडकर के लिए यह जीवन तथा इसके अनुभव ज़्यादा महत्व रखता है, वह पारलौकिक बातों और विचारों को महत्व नहीं देते। इसलिए वह यह भी मानते हैं कि “धर्म को इस जीवन के तथ्यों से सरोकार रखना चाहिए, ना कि ईश्वर, या आत्मा, या स्वर्ग या पृथ्वी के बारे में।” इसलिए धर्म ऐसा होना चाहिए जो ईश्वर या किसी पारलौकिक शक्ति को नहीं, बल्कि इंसान तथा नैतिकता को अपने केंद्र में रखे। किसी भी व्यक्ति का मूल्यांकन उसके जन्म/जाति से नहीं की जानी चाहिए, बल्कि उसके आचरण तथा नैतिकता से की जानी चाहिए।
“वास्तविक धर्म मनुष्यों के दिल में रहता है, शास्त्रों में नहीं।” ऐसी कोई भी चीज़ नहीं जो हमेशा रहे। सबकुछ नष्ट होता है; कुछ भी सनातन नहीं है। इस तरह वह शास्त्रों की प्रमाणिकता पर प्रश्न करते हैं।

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