महिला दिवस विशेष : नारीवाद पर चिंतन

Spread the love

महिला दिवस, महिलाओं की स्तिथि, उनके अधिकारों तथा उनके समाज में अपनी वर्तमान स्थिति बदलने के प्रयासों और संघर्षो को याद करने के लिए मनाया जाता है। भारत में स्त्री-विमर्श तथा नारीवादी चिंतन का क्षेत्र काफ़ी संकुचित है। इस अंतराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर हमें भारतीय नारीवादी चिंतन पर विचार करने की आवश्यक्ता है।

image credit: Chole S.

स्त्रियों की दुर्दशा लगभग सभी समाज की सच्चाई है। औरतों की वर्तमान स्थिति की अनेक कारण है, जिसमे प्रमुख है पितृसत्ता। पितृसत्ता न केवल एक सामाजिक व्यवस्था है, बल्कि एक वैचारिक व्यवस्था भी है। अर्थात इस व्यवस्था में सामाजिक तथा वैचारिक दोनों ही रूपों से, पुरुष को प्रधान, तथा अन्य को समाज में गौड़ स्थान प्राप्त है।लेकिन भारत में पितृसत्ता अपने साथ जातिवाद को भी मिला कर काम करती है। तो समाज में पुरुष या स्त्री होने के अलावा किसी की जाति उसका समाज में स्थान तय करता है.

नारीवाद का मुख्य उद्देश्य हर प्रकार की असामनता को ख़त्म करना है। अतः भारत में नारीवाद का कार्य जातिगत पितृसत्ता को दूर करना है। इसलिए हमें किसी भी प्रकार के यौन उत्पीड़न को समझने के लिए, पीड़ित तथा उत्पीड़क के जाति पर भी विचार करना चाहिए। उदाहरण के लिए, किसी उच्च जाति के पुरुष द्वारा दलित महिला का बलात्कार, केवल उसके पितृसत्तात्मक सोच की उपज नहीं है, यह उसकी जाति से मिले शक्ति और सामर्थ का प्रदर्शन भी है। वह दलितों की सामाजिक स्थिति से परिचित है इसलिए वह जानता है कि उसे कृत्य का उसे दंड नहीं भोगना होगा।पितृसत्ता कैसे जाति को पोषित करती है तथा जाती कैसे पितृसत्ता को, इस पर विचार करना बहुत आवश्यक है। इसलिए, जातिगत पितृसत्ता पर चिंतन भारतीय नारीवादी चिंतन का केंद्र होना चाहिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *