बुरा न मानो, होली है? लेकिन क्यों?

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होली रंग और खुशियाँ बाँटने का त्यौहार है। लेकिन इस त्यौहार को मनाने के नाम पर हम हमेशा सहमति और रजामंदी की भूमिका को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। इसका परिणाम यह होता की यह त्यौहार महिलाओं और बच्चों के साथ यौन-उत्पीड़न को बढ़ावा देने का कारण बन जाता है। अकसर लोग अपने किये को यह बोलकर के किया जाता है कि “बुरा न मानो होली है” और इसके ज़रिये सहमति के महत्व की धज्जिया उड़ा दिया जाती है।

होली मानना अन्य त्यौहार मानाने से अलग है। इसका मुख्य कारण है की जब कोई किसी को रंग लगाता है तो वह उस व्यक्ति विशेष के अंगो को छूता है। शारीरिक अंग हमारे लिए बहुत ही निजी होते हैं। इन्हे छूने से पहले इजाज़त लेना चाहिए।

आपसी सहमति इस त्यौहार को मनाने के लिए इसीकारण बहुत ही आवश्यक है। जबरदस्ती रंग लगाना और फिर यह कह देना कि “बुरा न मानो, होली है!” हमारे समाज में जहाँ सहमति को महत्वहीन बनता है, वहीं यौन शोषण को बढ़ावा देता है। किसी प्रकार के विरोध को होली के नाम पे अर्थहीन बता दिया जाता है। यही कारण है की होली यौन उत्पीड़कों के लिए सुनहरा अवसर साबित होता है।

एक पितृसत्तात्मक समाज अपने मूल्यों और आदर्शों का मूल्याङ्कन नहीं करता है। औरतों को होली पर घर से ना निकलने की सलाह दी जाती है। अज़नबियों से दूर रहने की हिदायत दी जाती है। लेकिन यौन शोषण घर में ही, घर के सदस्यों द्वारा किया भी किया जाता है, इस बात को अकसर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। लेकिन क्या ऐसा समाज कभी पुरुषों को उनके किये का जिम्मेदार ठहराता है? नही! हमें होली को प्रेम और खुशियों का त्यौहार बनाना है, ना कि उत्पीड़न का। इसलिए “बुरा न मानो, होली है!” कहना बंद करना होगा।

Image Source: Film: Yeh Jawaani hai Deewani (2013)

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