महामारी के दौर में कुछ चुनिंदे शेर

Spread the love

भारत एक महामारी के दौर से गुज़र रहा है। कोविड १९ के दूसरे दौर ने इतनी लाशे बिछायी हैं कि हमारे दिलों में अभी दुःख, भय, शंका और निराशा के सिवा कुछ भी नहीं है। इस समय में सरकार के रवैये पर लोगों में गहरी असंतुष्टि है। ऐसा नहीं है कि ये लाशे पहली बार बिछ रहीं है। कश्मीर, गुजरात, उत्तर प्रदेश तथा आदिवासी इलाके में ये सब आम बात हैं। हम सत्ता से सवाल पूछना तो दूर उसको समर्थन देने के प्रयास में लगे रहते हैं। फिर भी आज कई लोग सवाल पूछ रहे हैं। क्योंकि इस बार लाशें अपनों की है।
राहत इंदौरी याद दिलाते हुए कहते हैं कि

लगेगी आग आएंगे घर कई ज़द में
यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़े है

अब सबकी मकानों में आग की लपट आने लगी है। बहुतों ने सत्ता को जिम्मेदारी देना शुरू किया है। इस समय इरतिज़ा निशात का एक शेर बेहद प्रासंगिक है –

कुर्सी है तुम्हारा ये जनाज़ा तो नहीं है
कुछ कर नहीं सकते तो उतर क्यों नहीं जाते

Image Source: newsheads.in

सत्ता से नाउम्मीदी हमे हताश तो कर ही रही है। ऐसे में, फैज़ की गज़ल इस निराशा के समय में आशा भरता है कि बस थोड़े ही दिन की बात है, यह वक़्त भी कट जायेगा।

चंद रोज़ और मिरी जान फ़क़त चंद ही रोज़
ज़ुल्म की छाँव में दम लेने पे मजबूर हैं हम
दिल की बे-सूद तड़प जिस्म की मायूस पुकार
चंद रोज़ और मिरी जान फ़क़त चंद ही रोज़

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *