धर्म का व्यवहारिक स्वरुप: धंधा या दंगा

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धर्म की उत्पत्ति किस प्रकार हुई होगी ? शायद मनुष्य की उत्पत्ति हुई होगी और वह समूहों में रहना शुरू किया होगा इसलिए, पर किस आवश्यकता की वजह से धर्म का निर्माण हुआ होगा? शायद इसीलिए की हमेशा अच्छाई के साथ बुराई का भी जन्म होता है और उस वक्त कोई नियम – कानून नहीं था इसलिए शायद उस वक्त के अच्छे और विद्वान लोगों ने प्रकृति को ही आधार बनाकर नियम-कानून का निर्माण किया होगा, और जिस समूह के आस-पास का वातावरण जैसा होगा वैसे नियम-कानून बने होंगे और वही नियम-कानून धीरे-धीरे धर्म में परिवर्तित हो गया और धर्म को पूजा, मन्नत आदि के आधार पर धंधे में परिवर्तित कर दिया गया और आज धंधे के लिए लोग कुछ भी करने को तैयार हैं फिर वो दंगा ही क्यों न हो?

Image source: The Statesman


आप को याद ही होगा जब हमारा देश 1947 में आजाद हुआ था तब धार्मिक आधार पर देश के दो टुकड़े भी हुए थे।आज भी उस वक्त के लोगों से पूछिए कि वो क्या था, धर्म? न जाने कितने बेगुनाह मारे गए और आज भी दोनों तरफ से खुब सियासत होती हैं। एक गरीब जो रोज कमाता है और खाता है क्या उसे इन चीजों के लिए फुर्सत है विश्व में न जाने ऐसे कितने उदाहरण होगे? जब धर्म के ठेकेदारों को लगता है कि उनका धंधा मंदा हो रहा है तो वो आपको डराते हैं।
कहते हैं आज हमारा धर्म खतरे में पड़ गया है हमें अपने धर्म के लिए लड़ना पड़ेगा नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब हमारा अस्तित्व हमारा धर्म समाप्त हो जाएगा और आप निकल पड़ते हैं अपने धर्म की रक्षा के लिए और जिनके साथ कल तक भाईचारे के साथ रहते थे आज उन्हीं का सर काटने के लिए तैयार हो गए धर्म कट्टरता को जन्म देता है और वो इसी का फायदा उठाते हैं ।
मैं ये नहीं कहती कि धर्म का एक ही पहलु है कभी – कभी धर्म निराशा में आशा भी जगाता है जब इंसान दुनिया के बंधनों से त्रस्त हो जाता है तो ईश्वर की तलाश में निकलता है और जब किसी इंसान को लगता है कि उसका सब कुछ उसकी आंखों के सामने ही समाप्त हो गया और अब मृत्यु ही विकल्प है तो कहीं न कहीं ये भी एक आशा जगती है कि शायद ईश्वर का ही सबकुछ दिया हुआ था इसीलिए उन्होंने ले लिया।
कभी-कभी न्याय के नजरिए से भी स्वर्ग- नर्क की बातें करते हैं कि हमारे कर्मों के हिसाब से मृत्यु के पश्चात स्वर्ग और नर्क मिलता है। जबकि ऐसा कुछ भी होता नहीं है।
पर एक सवाल आज भी है कि ये ईश्वर की कल्पना हुई कैसे होगी ? शायद मेरे हिसाब से जिन – जिन लोगों ने अपने समय में न्याय की स्थापना की होगी उन्हें ईश्वर मान लिया गया होगा !
मैं बस इतना जानती हूं कि इंसान का कर्म ही उसका सबसे बड़ा धर्म होता है किसी भूखे को खाना खिलाकर देखो, किसी का सहारा बनो, लोगों से प्रेम से बातें करना, दुनिया को इंसानियत सिखाना ये है सर्वश्रेष्ठ धर्म।

अनिता सिन्ह ” आज़ादी ” की कलम से

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