विज्ञान पर अविश्वास : हम कोरोना महामारी को क्यों नही हरा पाये?

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भारत कोरोना महामारी के पहली लहर से तो उबर गया लेकिन दूसरे लहर ने जो नुकसान किया है उसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। ऐसे समय में हमसे कहाँ चूक हुई, इस बात पर विचार करना बेहद ज़रूरी हो जाता है। इस महामारी ने 2019 -20 में यूरोपीय देशों में काफ़ी नुकसान पहुँचाया, लेकिन एशियाई देशों में इस शुरूआती सत्र में इसका प्रसार तथा इससे होने वाली मौतों की संख्या कम थी। दिसम्बर-जनवरी माह तक आम जानता ने यह मान लिया था कि यह महामारी लगभग ख़त्म हो चुकी है। इस मानसिकता के विकास में हमारे प्रमुख नेताओं का कम हाथ नहीं है। लेकिन इस लेख में हम यह विचार करेंगें कि हमने खुद क्या गलतियां की हैं तथा अब हमें खुद को इसके तीसरी लहार के लिए कैसे तैयार करना है?

विज्ञान से ज़्यादा भगवान पे भरोसा

इस समय हम सबको बिना किसी झिझक के यह स्वीकार करना होगा कि आस्था और अन्धविश्वास ने इस महामारी को फ़ैलाने में बहुत मदद की है। जिस समय दुनिया विज्ञान की सहायता से कोरोना से लड़ने की कोशिश कर रहा था, वहीं हम मंदिरो का शिलान्यास, तथा गोमूत्र और गोबर में इलाज़ ढूंढ रहे थे। हमारे स्वास्थ्य मंत्री वैज्ञानिको को गौमूत्र पर शोध करने का प्रस्ताव दे रहे थे। आज भी लोग यह बोलकर प्रोटोकाल का उलंघन कर रहें हैं कि भगवान ने जिसकी मृत्यु लिख दी है उसे तो मरना ही है, तो मास्क पहनने और दूरी बरतने की ज़रूरत नहीं है।

अवैज्ञानिक दावों का खंडन ना होना

अभी भी देश के अलग-अलग हिस्सों में हमारे लोग इस महामारी से बचने के लिए व्रत, पूजा तथा अन्य धार्मिक अनुष्ठान कर रहे हैं , जिसमे शारीरिक दूरी के नियम की अवहेलना हो रही है। बहुत से बाबा लोग अपनी जड़ी-बूंटियों को कोरोना की दवा बताकर बेच रहें हैं। हमारी मीडिया इनके दावों का खंडन करने के बजाय उन्हें प्रोत्साहन दे रही जिसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। इनका प्रचार खुद स्वास्थ्य मंत्री तक करने में नहीं चूकते।

Image credit: India Post

वैज्ञानिक समुदाय की निष्क्रियता

वैज्ञानिक समुदाय वो समुदाय है जो ऐसे विचारों में विश्वास रखती है जिनके सच्चाई को हम साबित कर सकते हैं। ऐसे विचार धार्मिक या आस्था पर आधारित विचारों से अलग होते हैं क्योंकि धार्मिक विचारों की सत्यता हम साबित नहीं कर सकते। जैसे हम यह नहीं साबित कर सकते कि मरने के बाद स्वर्ग या नर्क मिलता है। वैज्ञानिक विचार रखने वाले लोग जैसे डॉक्टरों, अध्यापकों तथा स्वयं वैज्ञानिको ने सक्रिय रूप से अपने विचारों को लोगों के सामने रखने की कोशिश नहीं की। उन्होंने धार्मिक दावे करने वाले नेताओं की आलोचना पुरज़ोर तरीके से नहीं की। जिसके कारण हमारी जनता ने इन दावों पर आसानी भरोसा कर लिया।

इसलिए हमारे लिए ज़रूरी हैं कि हम अपने डॉक्टरों और वैज्ञानिकों की बात सुने। उनके लेखों को पढ़ें; उनके वीडियो को देखें। तथा किसी भी दावे पर आँख बंद करके विश्वास ना करें। साथ ही वैज्ञानिक समुदाय को भी अब साथ में आकर सभी प्रकार के फर्ज़ी दावों तथा अन्य अन्धविश्वास का खुलकर खंडन करना होगा। हमें अम्बेडकर की यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि जब तक हम अपने अज्ञानता के अंधकार से बाहर नहीं आ जाते तब तक हमें कोई बचा नहीं सकता।

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