मीराबाई प्राचीन भारत की आधुनिक स्त्री जिसने एक दलित को अपना गुरु बनाया

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मीराबाई सोलहवीं शताब्दी में जन्मी एक भक्तिकालीन कवियत्री हैं, जिसने अपने समय की अनेकों परम्पराएँ तोड़ी।। हमें उनके पद स्कूल-कालेजों में तो पढ़ाये जाते हैं, लेकिन उनके जीवन के बारे में बात न के बराबर ही होती है।

मीरा का जन्म राजपूत कुल में हुआ था। उनका विवाह बहुत ही कम आयु में हुआ तथा वह कम आयु में विधवा हो गयीं। उस समय विधवाओं की स्थिति काफ़ी दयनीय थी। उन्हें ना तो दुबारा विवाह करने का अधिकार था और न ही साधारण मनुष्यों की तरह जीवन जीने का। उनके पास जीने का केवल एक ही उपाय था कि वे अपना समय पूजा-पाठ में बिताये। मीरा ने भी यही किया लेकिन कृष्ण-भक्ति से उपजी आध्यात्मिकता ने उन्हें जिज्ञासु बना दिया। यही जिज्ञासा उन्हें संत रविदास के पास ले गयी। मीरा ने रविदास को अपना गुरु बनाया। रविदास स्वयं एक समाज-सुधारक थे। वे स्वयं निम्न जाति से थे तथा जातिवाद के पुरज़ोर विरोधी थे। मीरा का उनको गुरु बनाना ज़ाहिर है तथाकथित उच्चजाति वालों को मंज़ूर न था।

गौर करने की बात यह भी है कि जिस समय औरतों का घर से निकलना तथा पुरुषों से मिलना वर्जित था, ऐसे समय में मीरा न केवल घर से बाहर निकलकर अपने पद गातीं थीं, बल्कि सतसंगों में भी जाती थी। यही सारी वजह होगी कि उन्हें ज़हर दे कर मारने का भी प्रयास उन्हीं के घर वालों ने किया।

इस प्रकार मीरा ने अपने समय के बहुत सारी परम्पराओं तथा रूढ़ियों को तोड़ा। आधुनिकता की पहचान भी यही है कि व्यक्ति स्वयं को परम्परा के बंधनो से आज़ाद करे तथा अपने और अपने समाज को स्वतन्त्र सोच और विकास की ओर ले जाए। यही कारण है की मीरा पुराने समय की एक आधुनिक महिला हैं।

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