शोध या अनुसंधान : अर्थ तथा विशेषताएं

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परिचय

क्रेस्वेल के अनुसार, “शोध किसी विषय पर हमारे समझ को बढ़ाने के लिए डाटा इकठ्ठा करने तथा जानकारियों के विश्लेषण की प्रक्रिया है।” जब्कि, डेरेक (2004) के अनुसार, शोध या अनुसंधान प्राकृतिक, भौतिक तथा सामाजिक संसार के विभिन्न आयामों में एक प्रकार की खोज या जाँच है। इसे व्यवस्थित, आलोचनात्मक, अनुभवजन्य होना चाहिए। साथ में, इसमें अकादमिक अखंडता होनी चाहिए। इसका अर्थ है कि शोध की अकादमिक दुनिया में महत्व होना चाहिए, जिससे वो आगे शोध के लिए प्रोत्साहित कर सके।

अतः, शोध या अनुसंधान का विषय समाज के लिए महत्वपूर्ण होना चाहिए। उसमें एक नए प्रकार के ज्ञान उत्पन्न करने की क्षमता होनी चाहिए जिससे मनुष्य अपने विभिन्न प्रकार के बंधनो से मुक्ति पा सके। उदाहरण के लिए, जब वैज्ञानिकों द्वारा चंद्रग्रहण तथा सूर्यग्रहण की खोज की गई तो लोगों को विभिन्न प्रकार के अंधविश्वासों से मुक्ति मिलने में मदद मिलती है। इसी प्रकार, हमें अनुसंधान द्वारा मिले अन्य भौतिक तथा सामाजिक ज्ञान से अपने सीमितताओं से मुक्ति पाने का अवसर प्राप्त होता है।

शोध या अनुसंधान की विशेषताएं

पूर्वाग्रहों से मुक्त:

एक अच्छा शोध पूर्वाग्रहों से मुक्त होना चाहिए। शोध का उद्देश्य ही पहले से स्थापित ऐसी जानकारियों पर सवाल उठाना है, जिनकी सच्चाई जाने बिना ही लोग उनपर विश्वास करते आयें हों। इसलिए, शोध से स्थापित ज्ञान उन्हीं जानकारियों पर निर्भर होनी चाहिए जिसकी सत्यता या असत्यता को साबित किया जा सके।


नवीनता:

अनुसंधान का मुख्य उद्देश्य एक ऐसे ज्ञान की खोज करना है जिसकी खोज अभी तक हुई न हो। या फिर, जो ज्ञान पहले से ही प्राप्त है उनकी नई विवेचना या किसी नए आयाम के बारे में बात हो। अतः, नवीनता शोध की एक महत्वपूर्ण विशेषता है।


आलोचनात्मक:

शोध विभिन्न विषयों पर आलोचनात्मक दृष्टिकोण रखता है। इसका अर्थ है की शोध के दौरान शोधार्थी को शोध से जुड़ी अवधारणाओं और जानकारियों की समालोचनात्मक व्याख्या करनी चाहिए। किसी भी पक्ष या तथ्य को बिना जांचे अपना आधार नहीं बनाना चाहिए।


प्रासंगिक:

शोध की विषय-सामग्री वर्तमान समय प्रासंगिक होना चाहिए। उसे समाज के वर्तमान या निकट भविष्य की किसी समस्या का समाधान प्रस्तुत करने वाला होना चाहिए। दुर्भाग्यवश, भारतीय विश्वविद्यालयों में होने वाले ज्यादातर शोध अप्रासंगिक होते हैं। यही कारण हैं कि यहाँ शोध की गुणवत्ता अच्छी नहीं है और समाज के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभाती।

चक्रिक:

अनुसंधान वास्तव में एक चक्रिक प्रक्रिया है। शुरुआत में यह एक समस्या का समाधान प्रस्तुत करने की कोशिश करता है तथा अंत में एक नयी समस्या को जन्म देता है। यदि एक शोधार्थी भावी शोधार्थियों के लिए नए प्रश्न नहीं उठाता तो उस शोध की प्रांसगिकता नहीं रहती।

शोध-प्रक्रिया का संक्षिप्त विवरण –

शोध समस्या पर पहुँचना:

शोध करने के लिए शोधार्थी को सबसे पहले एक प्रासंगिक शोध समस्या तक पहुंचना होता है। इस समस्या पर ही उसके शोध का उद्देश्य आधारित होता है। लेकिन प्रश्न यह है कि इस तक पहुँचा कैसे जाय? तो, सबसे पहले शोधार्थी को अपने अध्ययन क्षेत्र से एक अपनी रूचि के अनुसार विषय चुनना चाहिए। उस विषय पर उपलब्ध सामग्री की समीक्षा करनी चाहिए। इस समीक्षा को साहित्य समीक्षा कहते हैं। उसके बाद, एक प्राकल्पना तैयार करना चाहिए जिसको शोध के दौरान सिद्ध करना है।

शोध-प्रारूप या संरचना तैयार करना:

जब शोध-समस्या और उसका उद्देश्य निर्धारित हो जाय तो एक संरचना तैयार करना चाहिए। इससे स्पष्ट हो जायेगा कि शोध कार्य को किन-किन चरणों में आगे बढ़ाना है।

रिसर्च प्रपोजल तैयार करना:

शोध-संरचना के बाद एक रिसर्च प्रपोजल तैयार करना होता है जिसे रिसर्च अडवाइसिरी कमेटी को स्वीकार करना है। रिसर्च प्रोपोसल शोध प्रारूप के आधार पर तैयार किया जाता है। How to Write a Research Proposal? (akhiripanna.com)

अध्याय लेखन:

जब प्रपोजल स्वीकार हो जाय तो अध्यायों को लिखना शुरू करना चाहिए। हर एक अध्याय की अपनी एक संरचना होती है। इसलिए, शोधार्थी को प्रत्येक अध्याय की संरचना तैयार करना चाहिए।

संक्षेप में, शोध एक जटिल प्रक्रिया है। इसलिए, पहले एक अच्छी योजना बना के उसकी संरचना तैयार करनी चाहिए। इस संरचना से यह स्पष्टता आ जाती है कि इस किन चरणों में पूरा करना है। चूँकि शोध या अनुसंधान एक लम्बी प्रक्रिया, अतः विषय की प्रांसगिकता के अलावा शोधार्थी को यह भी ध्यान देना चाहिए कि विषय उसके लिए रूचिकर हो।

शोध का अर्थ, परिभाषा, तत्व, विशेषताएं, महत्त्व और चरण – समाज कार्य शिक्षा (samajkaryshiksha.com)

पी.एच.डी. थीसिस: क्या और कैसे? – Akhiri Panna

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